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चेहरे / राजेश श्रीवास्तव

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“आइए साहिबान,
देखिए मैंने खोल ली है चेहरों की एक दुकान।
यहाँ चेहरे खरीदे और बेचे जाते हैं,
हमारे यहाँ उधार की भी व्यवस्था है,
आप यहाँ सब कुछ बेखौफ उगल सकते हैं
और चाहें तो दिन में दस चेहरे बदल सकते हैं।”

जिस दिन से मेरा ये विज्ञापन छपा है,
सारे शहर में हड़कंप मचा है,
क्योंकि शायद ही कोई ऐसा हो
जिसके पास अपना असली चेहरा बचा है।
इसलिए जिसे देखो जहाँ देखो
मेरी ओर दौड़ रहा है।
वो जिनको है चेहरों की तलाश,
वो जिनको है चेहरों से खराश,
जो एक के पीछे एक चेहरा छुपाए बैठे हैं,
जो कई कई चेहरों पर कब्जा जमाए बैंठे हैं,
जो अपने आप से भी घबराते हैं,
ऐसे ही ग्राहक मेरे पास आते हैं।

जी हाँ, इनका टेस्ट ही कुछ ऐसा है
जो एक बार भी इन नकली चेहरों का स्वाद चख जाते हैं,
यकीन मानिए, वे अपने असली चेहरे तक गिरवीं रख जाते हैं।

मेरा धंधा भी बड़ा अजीब है,
इससे चेहरा लेता हूँ, उसको चेहरा देता हूँ
मगर मैं किसी को नहीं बताता,
किससे चेहरा लिया है,
किसको चेहरा दिया है,
यही कारण है कि यदि कोई ग्राहक
अपने असली चेहरे में भी मेरे पास आ जाता है
तो उसे उधार लिया हुआ
नकली चेहरा ही समझा जाता है।
मैं सबको देखता और परखता हूँ
मगर सबकी गोपनीयता बरकरार रखता हूँ।

अब तक के इस धंधे में मैंने इतना तो जाना
आज के दौर का हर आदमी एक चरमराता विश्वास है
और किसी न किसी स्तर पर
हर आदमी को एक अदद चेहरे की तलाश है।
चेहरा दर चेहरा ऐसी फसल बो गया है
आज हर आदमी बदशक्ल हो गया है।
मैंने खोली थी ये दुकान
ताकि देख सकूं चेहरों के पीछे चेहरे,
ताकि जान सकूं संबंधों की गहराई,
ताकि माप सकूं प्यार की असलियत,
मगर ये क्या से क्या देखा
हर आदमी एक मुखौटा देखा।

मैं भी कहाँ बच सका श्रीमान,
अहसास के सीने तक पर छाले हो गए हैं
और कोयले की दलाली में दोस्त,
मेरे भी हाथ काले हो गए हैं।
इन नकली चेहरों को खरीदने बेचने में
मैं इतना व्यस्त हो गया
कि इन्हीं नकली चेहरों के बीच
मेरा असली चेहरा ही खो गया।
अभी-अभी कल तक तो था यहीं,
देखिए कहीं आपके पास तो नहीं।
मैंने आपको इतने चेहरे, इतनी सूरतें, इतनी पहचानें दी हैं
तो मुझ पर बस इतनी सी कृपा कीजिए,
सड़क पर, कबाड़ी की दुकान पर, किसी गोदाम में,
यदि कहीं पड़ा मिले-मेरा चेहरा मुझे लौटा दीजिए,
मेरा चेहरा मुझे लौटा दीजिए।