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जनता की रोटी / बर्तोल ब्रेख्त / वीणा भाटिया

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न्याय, असल में
जनता की रोटी है
जो पर्याप्त होती है कभी
और कभी दुर्लभ
कभी यह स्वादिष्ट होती है
और कभी फीकी
दुर्लभ हो जाती है रोटी
तो क्षुधा बन जाती है
और जब बेस्वाद हो तो असंतोष।

खोटे न्याय को फेंक दो
जो बिना सूचना और सरोकार के हो
स्वाद के बिना न्याय धूसर होता है
औप बासी न्याय जो विलम्बित हो जाता है, फेंक दो

यदि रोटी स्वादिष्ट और पर्याप्त हो
तो बाक़ी की चीज़ों से बचा जा सकता है
कि एक समय में सब कुछ नहीं पाया जा सकता
जिससे पर्याप्त रोटी प्राप्त हो
जिस तरह रोज़ की रोटी
उसी तरह होता है ज़रूरी न्याय।

दिन में
कई बार
आवश्यक होता है यह भी

सुबहो शाम
काम आराम और दुश्वार समयों में
लोगों को दरकार होती है – न्याय की रोटी

चूँकि इतनी आवश्यक है – न्याय की रोटी
तो दोस्तो – इसे पकाएगा कौन ?

रोटी को कौन पकाता है ?
दूसरी रोटी की तरह ही
न्याय की रोटी पकाई जानी चाहिए
लोगों के द्वारा – काफी पौष्टिक और हमेशा-हमेशा।

अँग्रेज़ी से अनुवाद : वीणा भाटिया