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जननि जगावति , उठौ कन्हाई / सूरदास

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राग सूहो बिलावल


जननि जगावति , उठौ कन्हाई !
प्रगट्यौ तरनि, किरनि महि छाई ॥
आवहु चंद्र-बदन दिखराई ।
बार-बार जननी बलि जाई ॥
सखा द्वार सब तुमहिं बुलावत ।
तुम कारन हम धाए आवत ॥
सूर स्याम उठि दरसन दीन्हौ ।
माता देखि मुदित मन कीन्हौ ॥

माता जगा रही है - `कन्हाई ! उठो । सूर्य उग गया, उसकी किरणें पृथ्वी पर फैल गयीं । आओ, अपना चन्द्रमुख दिखलाओ, मैया बार-बार बलिहारी जाती है । सब सखा द्वार पर खड़े तुमको बुला रहे हैं कि `मोहन! तुम्हारे लिये ही हम दौड़े आते हैं।' सूरदास जी कहते हैं कि श्यामसुन्दर ने (यह सुनकर) उठकर दर्शन दिया, उन्हें देखकर माता का मन आनन्दित हो गया ।