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जल-परी / मिख़ाइल लेरमन्तफ़ / मदनलाल मधु

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1

तैर रही थी एक जल-परी नीली नदिया में
चमक रही थी जो पूनम के चन्दा की छबिया में,
यत्नशील जल-परी चाँद तक किसी तरह जाए
और रुपहले ऊर्मि-फेन से उसको नहलाए।

2

शोर मचाती, भँवर बनाती, डोले सरि कल-छल
और हो रहे थे प्रतिबिम्बित उसमें नभ, बादल
गाती थी जल-परी, दूर तक स्वर लहराते थे
वे नदिया के खड़े तटों को छू-छू आते थे।

3

गाती थी जल-परी, "हमारे इस सरिता-तल में
दिवस-उजाला झिलमिल करता इस गहरे जल में,
स्वर्ण-सुनहरी वहाँ मछलियाँ घूमें नहीं शुमार
स्फटिक-रुपहले नगरोंकी है महिमा बड़ी अपार।

4

उसी जगह तो रंग-बिरंगे बालू तकियों पर
जहाँ बेंत के घने झुरमुटों की छाया सुखकर,
वीर सो रहा, लहर जलन से जिसे बहा लाई
किसी पराए, दूर देश का परदेसी राही।

5

उसके रेशम जैसे अति घुंघराले बालों पर
हमें फेरना कंघी रुचता, जब हो रात्रि-तिमिर,
होती जब दोपहरी, तो हम सबने ही अक्सर
उस सुरूप का माथा चूमा, चूमे मधुर अधर।

6

किन्तु न जाने क्यों हम सब के, उद्वेगी चुम्बन
उस पर असर न करते, वह तो रहे मूक, उन्मन,
मेरी छाती पर अपना सिर रखकर वह सोता,
साँस न लेता और न सपनों में विचलित होता !...

7

कुछ ऐसा नीली नदिया में गाए नीर-परी
वह अनबूझ कसक-पीड़ा से मानो भरी-भरी।
शोर मचाती, भँवर बनाती, डोलेसरि कल-छल
और हो रहे थे प्रतिबिम्बित उस में नभ, बादल।
  
1839
मूल रूसी से अनुवाद : मदनलाल मधु

और अब यह कविता मूल रूसी भाषा में पढ़ें
  
                   Русалка

1

Русалка плыла по реке голубой,
Озаряема полной луной;
И старалась она доплеснуть до луны
Серебристую пену волны.

2

5И шумя и крутясь колебала река
Отраженные в ней облака;
И пела русалка — и звук ее слов
Долетал до крутых берегов.

3

И пела русалка: «на дне у меня
10Играет мерцание дня;
Там рыбок златые гуляют стада;
Там хрустальные есть города;

4

И там на подушке из ярких песков
Под тенью густых тростников
15Спит витязь, добыча ревнивой волны,
Спит витязь чужой стороны...

5

Расчесывать кольцы шелковых кудрей
Мы любим во мраке ночей,
И в чело и в уста мы в полуденный час
20Целовали красавца не раз;

6

Но к страстным лобзаньям, не знаю зачем,
Остается он хладен и нем,
Он спит, — и склонившись на перси ко мне,
Он не дышет, не шепчет во сне».

7

25Так пела русалка над синей рекой
Полна непонятной тоской;
И шумно катясь колебала река
Отраженные в ней облака.

1832