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ज़बान-ए-ख़ल्क़ को चुप आस्तीं को तर पा कर / सिद्दीक़ मुजीबी

ज़बान-ए-ख़ल्क़ को चुप आस्तीं को तर पा कर
मैं आब-दीदा हवा ख़ूँ को दर-ब-दर पा कर

ये किस के क़ुर्ब की ख़ुशबू बसी है साँसों में
ये मुझ से कौन मिला मुझे को बे-ख़बर पा कर

सफ़र की शर्त कभी इस क़दर कड़ी कब थी
थकन कुछ और बढ़ी साया-ए-शजर पा कर

वो सब्ज़-तन था शफ़क़ पैरहन खुला उस पर
बना गुलाब सा वो लम्स यक नज़र पा कर

वो ना-शनास-ए-तबीअत है जानता था मैं
वो हैरतों में रहा तेग़ को सिपर पा कर

अभी अभी मैं जिस दफ़्न कर के लौटा हूँ
बहुत अजीब लगा उस को अपने घर पा कर