भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

ज़माने की लहर / माधव शुक्ल

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

ये दिल में आता है उठ खड़े हों, समय हमें अब जगा रहा है।
बिला हुए तार भी लहू में, वो तार बर्की लगा रहा है।।
जहाँ अँधेरा था मुद्दतों से, न देख सकता कोई किसी को।
उसी जिगर में छिपा हुआ, कुछ न जाने क्या जगमगा रहा है।।
उरूजवाले बिगड़ रहे हैं, हज़ारों बिगड़े सँवर रहे हैं।
करिश्मे कुदरत के कौन जाने, ये बात वो है जो लापता है।।
कभी भी मायूस हो न 'माधो',ज़माना ये इनकिलाब का है।
उठाना सबको ये काम है इसका, जो अपनी हस्ती मिटा रहा है।।