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ज़रा क़रीब तो आओ के रात कट जाए / नासिर परवेज़

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ज़रा क़रीब तो आओ के रात कट जाए
कोई ग़ज़ल ही सुनाओ के रात कट जाए

ये तीरगी, ये उदासी, ये वहशतें दिल की
अभी न छोड़ के जाओ के रात कट जाए

मुझे है बार-ए-समाअत ये ख़ामशी जानाँ
ख़ुदारा लब तो हिलाओ के रात कट जाए

वही ख़ुतूत जिन्हें जान से अज़ीज़ रखा
वही ख़ुतूत जलाओ के रात कट जाए

फ़िराक़-ए-यार का कुछ तज़किरा तवील करो
नई कहानी बनाओ के रात कट जाए

वो एक बात जो तुमसे कभी कही ही नहीं
वो बात याद दिलाओ के रात कट जाए

बड़ी कठिन हैं ये रातों की मन्ज़िले नासिर
सुख़न के दीप जलाओ के रात कट जाए