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ज़िद में बसने की भटकना होगा अब बसेरा कहीं नहीं दिखता / विनय कुमार

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ज़िद में बसने की भटकना होगा अब बसेरा कहीं नहीं दिखता।
बात करते हो तुम फुफेरों की जब चचेरा कहीं नहीं दिखता।

जिस पिटारी का खोलता हूं मुंह सांप फन काढ़े हुए दिखते हैं
जिसने सांपों को बसाया हरसू वह संपेरा कहीं नहीं दिखता।

अब न आँखों में नमी आती है, बर्फ़ भीतर से जमी आती है
तू है मेरा मगर न मैं तेरा कुछ भी तेरा कहीं नहीं दिखता।

जिसके पकने से फ़लक फबता था, जिसके फटने से सुबह होती थी
जिस अंधेरे में कुछ हरापन था वह अंधेरा कहीं नहीं दिखता।

फ़ौज, हाक़िम, वज़ीर, शहंशाह सब हैं आगाह और हैं मुस्तैद
लम्हा लम्हा है ख़बर है लुटने की पर लुटेरा कहीं नहीं दिखता।