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जाने क्या है बात / ओसिप मंदेलश्ताम

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जाने क्या है बात
मन मेरा गाये आज
हालाँकि बहुत कम है
मेरे निकट प्रिय नाम
संवेगी लय के क्षण भी
आते हैं कभी-कभी
वैसे ही जैसे बहे
अकवीलोन[1] अचानक ही
वो हमेशा उड़ाए बादल धूल भरे
तेज़ी से फरफराएँ काग़ज़ के फर्रे
एक बार वो जाए, फिर कभी न लौट के आए
और यदि आ जाए तो दूजा रूप धराए
ओ हवा तू चौड़ी-चकली
गाये ओरफ़ेय[2] तेरे गीत
तू उड़ जाएगी समुद्र तक
लिए साथ में मेरी प्रीत
मैं भूल चुका हूँ ‘स्व’ अपना
दयालु दुनिया का सपना
जो आज भी है जरूरी
पर अभी तक अनिर्मित
भटक गया मैं खिलौनेनुमा इस प्याले में
अटक गया मैं नीली खोह के जाले में
सोच रहा हूँ क्या मैं सचमुच जीवित हूँ
और कभी सच में क्या मैं
होऊँगा मौत के पाले में

1911
 

शब्दार्थ
  1. प्राचीन लातिनी भाषा में उत्तरी हवा को अकवीलोन कहा जाता था।
  2. यूनानी मिथक परम्परा में एक प्रसिद्ध कवि, जिसमें कला की जादुई ताकत भरी थी।