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ज़िन्दगी गोया शिकस्त-ए-साज़ से कुछ कम नहीं / प्राण शर्मा

  
ज़िन्दगी गोया शिकस्त-ए-साज़ से कुछ कम नहीं
अपनी ख़ामोशी मगर आवाज़ से कुछ कम नहीं

रात के जलते परों ने आग बरसाई बहुत
चांदनी भी इक तेरे अन्दाज़ से कुछ कम नहीं

खनखनाती हैं अज़ल की बेड़ियां हर आन में
जी रहे हैं ये तेरे एजाज़ से कुछ कम नहीं

रंग-ए-गुल लम्हात की धड़कन से बिछड़ा गीत है
सोज़ होना गीत का इक राज़ से कुछ कम नहीं

साँस की बुझती चिताओं में है नक्श-ए-ज़िन्दगी
सांस का अंजाम भी आवाज़ से कुछ कम नहीं