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जिसके सम्मोहन में पाग़ल, धरती है, आकाश भी है / अदम गोंडवी

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जिसके सम्मोहन में पाग़ल, धरती है, आकाश भी है ।
एक पहेली-सी ये दुनिया, गल्प भी है, इतिहास भी है।

चिन्तन के सोपान पर चढ़कर चाँद-सितारे छू आए,
लेकिन मन की गहराई में माटी की बू-बास भी है ।

मानव-मन के द्वन्द्व को आख़िर किस साँचे में ढालोगे,
महारास की पृष्ठभूमि में 'ओशो'[1] का संन्यास भी है ।

अमृत की बूँदें बरसी थीं तब हमने मुँह फेर लिया,
आज ख़ुशी से ज़ह्र पी रहे और इसका एहसास भी है ।

इन्द्रधनुष के पुल से गुज़रकर उस बस्ती तक आए हैं,
जहाँ भूख की धूप सलोनी चंचल है बिन्दास भी है ।

कंक्रीट के इस जंगल में फूल खिले पर गन्ध नहीं,
स्मृतियों की घाटी में यूँ कहने को मधुमास भी है ।

शब्दार्थ
  1. आचार्य रजनीश को ओशो भी कहते हैं