जीने के लिए सर में कोई खब्त तो हो
बे-राह-रवी में भी कोई ज़ब्त तो हो
बेकार से बेगार भली है, माना
यक-गौना मगर उस में भी इक रब्त तो हो।
जीने के लिए सर में कोई खब्त तो हो
बे-राह-रवी में भी कोई ज़ब्त तो हो
बेकार से बेगार भली है, माना
यक-गौना मगर उस में भी इक रब्त तो हो।