जीवन एक सभ्यता / संतोष श्रीवास्तव
जम्मू से नर्मदा नदी के
मुहाने तक
बलूचिस्तान के मरकाना
तट से मेरठ तक
चारों दिशाओं में
मोहनजोदड़ो हड़प्पा की
सभ्यता के अवशेष
जैसे मैं हजारों साल
के सफ़र से
अब पहुँची हूँ
अपनी खोज के छोर पर
मीलों मील फैले
हड़प्पा मोहनजोदड़ो के
नगरों के अवशेष
ईंटों के खंडहर
इन्हीं में मानव अस्थियाँ
आज भी सुरक्षित
सिहर उठी हूँ
उन दो कंकालों को देखकर
जो निहार रहे हैं
एक दूसरे को
प्रेम का विशाल लेकिन
दिल को
कचोटने वाला दृश्य
मानो निहारते हुए ही
दुनिया छोड़ गया
वह प्रेमी युगल
दीवारें अब ईंटों की
मेड़ में बदल गई हैं
मेड़ों से घिरे बाज़ार
रही होगी रौनक,
चहल-पहल
हंसी खिलखिलाहट
शयनागार, रसोई ,बर्तन
पका होगा
जिसमें सुस्वादु भोजन
चित्रलिपियाँ
उचाट कर देती हैं मन
सैंधवी लिपि में लिखे
अजनबी से शिलालेख
भित्तिचित्र
हजारों साल पहले
विकसित सभ्यता
नष्ट हो गई !
रह गए निशान, मुँहबाए
जीवन का कितना कड़वा सच
सिहर उठी हूँ
कितना सुंदर संसार है
आखिरी सांस लेते ही
छूट जाता है सब कुछ
जीवन सभ्यता बनकर
रह जाता है ,खंडहरों में