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जेबकतरा / निलय उपाध्याय

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मालवानी की चाल में
पूरे एक महीने के
प्रशिक्षण के बाद निकला था
जेबकतरा
आज पहला दिन था उसका
बोहनी का दिन ।

मुम्बई की लोकल मे,
उसे हर स्टेशन पर उतरना था
और करना था
उस्ताद को फ़ोन

दस दिनों तक सीखा था उसने
नाख़ून के भीतर ब्लेड घुसाना
दस दिनों तक सीखा
पानी से भरे बर्तन मे कमल के पत्ते पर
इस तरह मारना ब्लेड कि पानी की बून्द
ब्लेड पर न पड़े और आख़िरी दस दिनो तक
अँग्रेज़ी के वी आकृति मे जेब पर ब्लेड चलाना
ताकि आसानी से आकर
हाथ मे गिरे पर्स

मलाड मे
फ़ोन कर उस्ताद को किया प्रणाम
कामयाबी की दुआएँ ली और सवार हो गया
मुम्बई की लोकल में, पहले देखो, समझो
फ़िर लगाओ हाथ, उस्ताद की नसीहत
याद करने मे पता ही नहीं चला
कब आ गया गोरेगाँव

गोरेगाँव उतर गया
और दूसरी ट्रेन के आने के पहले
जब लगाया फ़ोन अपने उस्ताद को
रह गया भौंचक, पैसा ही नही बचा था मोबाईल मे
उस्ताद से बात करने के बाद शेष थे
चौवन रूपए पचास पैसे मोबाईल में,
किसने काट लिए आते आते
गोरेगाँव