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जो बाद-ए-मर्ग भी दिल को रही किनार में जा / 'ममनून' निज़ामुद्दीन

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जो बाद-ए-मर्ग भी दिल को रही किनार में जा
तो सो चुका मैं फ़राग़त से बस मज़ार में जा

तमाम दर्द हों मालूम कुछ नहीं कि कहाँ
तेरे ख़दंग ने की है तन-ए-नज़ार में जा

यही तो रिज़्क है बाद-ए-फ़ना मेरा ज़ालिम
समझ के बर्क़-ए-शरर-बार ख़ार-ज़ार में जा

क़दम समझ के तू रख तिश्नगान-ए-हसरत से
तिही नहीं है टुक उल्फ़त की रह-गुज़ार में जा

उठी जो कुल्फ़त-ए-दिल कम हो मेरी कुल्फ़त में
ग़ुबार जैसे के मिल जाए है ग़ुबार में जा

न हो कहीं के दो-सद-ख़ून-ए-खुफ़्ता हों बे-दार
सबा जो जाए तो आहिस्ता कू-ए-यार में जा

ख़दंग-ए-ग़मज़ा तो ख़ार-ए-शिगाफ़ है उस का
छुपाए जी को कोई कौन से हिसार में जा