ठौर / पद्मजा बाजपेयी

भटका मन गली-गली, मिला नहीं ठौर कहीं?
चाहत थी सुकून मिले, मगर कहीं चैन नहीं।
भटका मन...1

प्यासा मन लिए फिरूँ, कूप, नदी पनघट तक,
रिक्तता ही रिक्तता है, शबनम की बूंद नहीं।
भटका मन...2

इतना समझता हूँ, यहाँ सब पराये हैं,
कुछ पहर काट लूँ, इसमे कोई भूल नहीं।
भटका मन...3

अपने कहने वाले, अपनों को छलते हैं,
सारा जग अपना है, इसमे कोई गैर नहीं।
भटका मन...4

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