भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

डावड़ी, करलै मीठी बातां ! / देवकिशन राजपुरोहित

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

डावड़ी, करलै मीठी बातां !
आ च्यार दिनां री चमक-चानणी, फेर अंधारी रातां ।
रूं-रूं में थारै जबर जवानी, देर न लागै जातां ॥
डावड़ी, करलै मीठी बातां !
क्यांनैं गतब करै जोबन रो, थिर नहीं थारै हाथां ।
थिर न जवानी रंग-रूप है, क्यूं गरबीजै पातां ॥
डावड़ी, करलै मीठी बातां !
ओ माटी में काल मिलैला, रुकै न रोक्यां जागां ।
भला करम करलै ए डावड़ी, ओ ही चालसी साथां ॥
डावड़ी, करलै मीठी बातां !
ओढ्यां। पैरियां फिरै एकेली, जीव न लागै जागां ।
मन रो पंछी फिरै डोलतो, भटकै बागां-बागां ॥
डावड़ी, करलै मीठी बातां !
गोरड़ी क्यूं करै मिजाज, प्रेम सूं करलै मीठी बातां ।
धन जोबन माटी मिल ज्यासी, रोक्यो रुकै न जातां ॥
डावड़ी, करलै मीठी बातां !
एक आसरो लेय गुरु रो, पकड़ उणां नैं बाथां ।
देवकिशन कहै, सुण गजेसिंह, गावो गुरु री गाथा ॥
डावड़ी, करलै मीठी बातां !