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तज्रबे जबसे लड़कपन से सयाने हो गए / सूरज राय 'सूरज'

तज्रबे जबसे लड़कपन से सयाने हो गए
सैंकड़ों दामन बचाने के बहाने हो गए॥

कोई भी मरहम उन्हें भर पाए अब मुमकिन नहीं
मर चुका एहसास ओ घाव पुराने हो गए॥

धर्म ने भी हाथ थामा वक़्त का कुछ इस तरह
कल जहाँ मन्दिर हुआ करते थे, थाने हो गए॥

घर पहुंचने के लिये ढूंढो तरीका और कुछ
रास्ते तो शादियों के शामियाने हो गए॥

फेंक दी बच्चों ने कचरे में नसीहत-नीतियां
जो खज़ाने थे हमारे, चार आने हो गए॥

इक भिखारी ने सवाले-घर पर बस इतना कहा
एक अलमारी थी जिसके आठ खाने हो गए॥

आँधियों ने प्राणवायु भी हमारी छीन ली
थे जहाँ जंगल धुओं के कारखाने हो गए॥

कर दिया उर्याँ ज़मीं को नोंच डाला जिस्म को
अब हवस के चाँद- "सूरज" भी निशाने हो गए॥