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तमाशा है सब कुछ मगर कुछ नहीं / ज़िया फतेहाबादी

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तमाशा है सब कुछ मगर कुछ नहीं ।
सिवाए फ़रेब-ए नज़र कुछ नहीं ।

ज़माना ये है रक्स-ए ज़र्रात का,
हिकायात-ए ओ क़मर कुछ नहीं ।

सितारों से आगे मेरी मंज़िलें,
बला से अगर बाल-ओ पर कुछ नहीं ।

मुहब्बत की ये महवीयत क्या कहूँ,
वो आए तो अपनी ख़बर कुछ नहीं ।

मेरा शौक़ ए मंज़िल है साबित क़दम,
कोई रहज़न-ओ राहबर कुछ नहीं ।

मुहब्बत है इन्सान की आबरू,
बग़ैर-ए मुहब्बत बसर कुछ नहीं ।

’ज़िया’ तो मरीज़-ए ग़म-ए इश्क़ है
इलाज इसका ऐ चारागर, कुछ नहीं ।