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तहरे विरह-ताप ह / रवीन्द्रनाथ ठाकुर / सिपाही सिंह ‘श्रीमंत’

तहरे विरह-तप ह
जे रात-दिन
भुवन भर में
सगरे सुनुग रहल बा।
तहरे विरह-तप ह
जे वन, परबत, आकाश
आ सागर के विविध रूपन में
व्यक्त हो रहल बा।
तहरे विरह-तप ह
जे रात-रत भर
चुपचाप
जोन्हिन के दीया लेके
अपलक नयन से
ताकत रह जाला।
तहरे विरह-तप ह
जे सावन के रिमझिम में
पतइन के गीत बनल
वन-वन में बजेल।
तहरे विरह-तप ह
जे प्रेम प्यार वासना बन
सुख-दुःख बन, वेदना बन
घर-घर में छवले ब।

तहरे विरह-तप ह
जे जीवन के उदास कइले
हृदय में समाइल बा।
गीत-स्वर बन-बन के
पिघल-पिघल आइल ब।