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तुमने ग़ाली मुझे नहीं, अपने ही को दी है / वीरेन्द्र कुमार जैन

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तुमने ग़ाली मुझे नहीं,
अपने ही को दी है :
तुम पर मुझे क्रोध नहीं आया,
करूणा आ गई :
तुम्हारे गुस्से से तनी
कपाल की नस देखकर।

हाय तुम इतने सुन्दर,
पल मात्र में क्यों हो गए इतने असुन्दर :
यह मुझे सह्य नहीं है :
अपनी ही सूरत मुझे बदसूरत लग उठी।
लाओ, तुम्हारी तनी हुई रगों को सहला दूँ
अरे मैं कितना सुन्दर हूँ
आज पहली ही बार पता चला...।