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तुम्हारे शहर में ये बेघरों को मान मिला / ज्ञान प्रकाश विवेक

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तुम्हारे शहर में ये बेघरों को मान मिला
मिला मकान तो हिलता हुआ मकान मिला

मैं गुफ़्तगू की भला किससे इल्तजा करता
कि जो मिला मुझे बस्ती में बेज़बान मिला

तू मुझसे पूछ कि उन पक्षियों पे क्या गुज़री
जिन्हें उड़ान की ख़ातिर न आसमान मिला

अकेले रास्तों का क्या बताऊँ दर्द तुम्हें
कि चीखता हुआ पैरों का हर निशान मिला

मेरे लहू को परोसा है उसने मेरे लिए
कि वहशतों के शहर में जो मेज़बान मिला.