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तुम्हें क्या पसन्द है मुझ में ? / स्वप्निल स्मृति / चन्द्र गुरुङ

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तुम्हें जो पसन्द है मुझ में -–
मैं वही दूँगा ।

कितनों को मेरा चेहरा पसन्द आया
कितनों को मेरा दुख पसन्द आया
...पर नहीं दिया ।

कितनों ने आँसू माँगे
शायद याद आए होंगे उनके अपने विगत
कितनों ने मेरे ख़ुशी के उत्सव में नाचना चाहा
मिले होंगे मुझ में सुरीले गीत
कितनों ने चढाई में हाथ दिए
शायद पसन्द किया होगा मुझ अकेले को
कितनों ने गुलाब के फूल दिए
पूजते हुए देवी देवताओं को ।
पर मैने स्वीकार नहीं किया ।

बहुतों ने मुझे अपने नाम दिए, पते दिए
अपने आप धन्यवाद दिए,
शुभकामनाएँ दीं
और दिए ख़ाली काग़ज़ के पन्नें
अनुरोध किया लिखने का प्रेमपूर्ण कविताओं के कुछ अक्षर
बहुत से आँखो से चुनकर ले गए मेरा परिचय
और भेजे नीले लिफ़ाफ़े
पर मैंने नहीं भेजा कुछ भी जवाब
बल्कि बहा हूँ बारम्बार हिम-बाढ़ की तरह
निर्जन अन्तों में
मानों ठिठक के खड़ा रहा हूँ
जैसे खड़ा होता है माउण्ट एवरेस्ट पर्यटक के कैमरे के सामने ।

आए-गए कितने प्रेम-दिवस
आया-गया हर साल नया वर्ष
पर मैं जिया हूँ अकेला ...अकेला...
जैसे वास्ता नहीं होता -–
नदी को पुल से
फूल को भँवरे से
आईने को चेहरे से ।

परन्तु,
परन्तु
मैं आज तुम तक इस तरह आया हूँ
जैसे आते हैं
घर-आँगन में बिन बुलाए भिखारी ।

तुम भी खड़े हो
मेरे सामने
न जानते हुए भी, पहचाने से
जैसे घर की मालिकन दहलीज़ में खड़ी होती हैं
और देखती हैं भिखारियों को ।

तुम्हारा दिल मुझे पसन्द है
तुम्हारा जीवन मुझे पसन्द है
तुम्हारे खड़े होने का तरीका पसन्द है ।

मैं सिर्फ़ तुम्हें प्यार करने आया हूँ
प्यार के लिए
हथेली भर का आयतन फैलाए हुए हूँ ।

तुम्हें क्या पसन्द है मुझ में
बोलो, मैं वही दूँगा ।