भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

तुलसीदास / पढ़ीस

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

कबि आहिन तुलसीदास,
रमय्या राम के।
तुम सुंदर सीता - राम,
सलोने नाम के।
सुर-गंगा जसि बहयि कल्पन
भाउ-भँवर की धार,
डारि दिह्यन कविता की डोंगिया
रामु लगावयि पार।
रमय्या राम के।
दस दुआर सुंदर मनि-मंदिरू
कनक - चउतरा माँझ-
सीता सहित रामजी राजयिं,
जहाँ न दुपहर - साँझ।
रमय्या राम के।
जनक - नगर की फुलवारी माँ
फूलि - फलीं जगदम्ब;
जगत - पिता साकेत धाम
आए न कीन्ह ब्यिलम्ब[1]
रमय्या राम के।
कपटिनि कयिसि केकयी रानी
राजा - मति हरि लीन,
संुदर पूतु - पत्वाह[2] किहिस
बनबासु हीनि दुख दीनि।
रमय्या राम के।
सुबरन रेखा [3] मिरगा माया
सिया हिया छलु लीन,
दबका[4] रहइ दसाननु दउरा[5]
जनक-सुता हरि लीन।
रमय्या राम के।
किसकिंधा सुगरींव मितायी,
पवन - पूतु सत संग;
सीता खातिन सैना साजिनि
फरकि उठे सुभ अंग-
रमय्या राम के।
भरा अबूहु[6] महासागरू फिरि
सूझयि वार न छ्वार
महाबीर अगुआ की पल्टनि
सेतु बाँधि भयि पार।
रमय्या राम के।
मेघनादु जस जिहि का लरिका-
कुंभकरन अस भाइ,
रहा रावना जोधा[7] जूझा [8]
अयिंस्यन रामु रजायि[9]
रमय्या राम के।
सीता जीति रामु जी लाये
जब सतयें सोपान;
जागि उठा जगु जगमग-जगमग,
भूला अपन-ब्यिरान[10]
रमय्या राम के।
सीता सकती[11] रहयिं राम की,
मुलु जग - जलनी नारि;
तिहिंते गयी समायि अगिनि माँ
सुंन्दरि बही बयारि।
रमय्या राम के।

शब्दार्थ
  1. बिलम्ब, देर
  2. पुत्र-पुत्रवधू
  3. स्वर्ण-रेखा, सोने की लाइन
  4. छिपा हुआ
  5. दौड़ा आया
  6. अथाह, अगम्य
  7. योद्वा
  8. जूझना
  9. रजामन्दी, मर्जी, इच्छा
  10. अपना-पराया
  11. शक्ति