भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

तू आश्‍ना-ए-जज़्बा-ए-उल्फ़त नहीं रहा / नून मीम राशिद

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

तू आश्‍ना-ए-जज़्बा-ए-उल्फ़त नहीं रहा
दिल में तेरे वो ज़ौक़-ए-मोहब्बत नहीं रहा

फिर नग़मा-हा-ए-कुम तो फ़ज़ा में हैं गूँजते
तू ही हरीफ़-ए-ज़ौक़-ए-समाअत नहीं रहा

आईं कहाँ से आँख में आतिश-चिकनियाँ
दिल आश्‍ना-ए-सोज़-ए-मोहब्बत नहीं रहा

गुल-हा-ए-हुस्न-ए-यार में दामन-कश-ए-नज़र
मैं अब हरीस-ए-गुलशन-ए-जन्नत नहीं रहा

शायद जुनूँ है माइल-ए-फ़र्जानगी मेरा
मैं वो नहीं वो आलम-ए-वहशत नहीं रहा

ममनून हूँ मैं तेरा बहुत मर्ग-ए-ना-गहाँ
मैं अब असीर-ए-गर्दिश-ए-क़िस्मत नहीं रहा

जल्वागह-ए-ख़याल में वो आ गए हैं आज
लो मैं रहीन-ए-ज़हमत-ए-ख़ल्वत नहीं रहा

क्या फाएदा है दावा-ए-इशक-ए-हुसैन से
सर में अगर वो शौक-ए-शहादत नहीं रहा