भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

तू जो मेरे सुर में सुर मिला ले / रविन्द्र जैन

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

तू जो मेरे सुर में
सुर मिला ले, संग गा ले
तो ज़िंदगी हो जाए सफ़ल

तू जो मेरे मन का
घर बना ले, मन लगा ले
तो बंदगी हो जाए सफ़ल
तू जो मेरे सुर में

चाँदनी रातों में, हाथ लिए हाथों में
चाँदनी रातों में, हाथ लिए हाथों में
डूबे रहें एक दूसरे की, रस भरी बातों में
तू जो मेरे संग में
मुस्कुरा ले, गुनगुना ले
तो ज़िंदगी हो जाए सफ़ल
तू जो मेरे मन का...
तू जो मेरे सुर में...

क्यों हम बहारों से, खुशियाँ उधार लें
क्यों हम बहारों से, खुशियाँ उधार लें
क्यों न मिलके हम खुद ही अपना जीवन सुधार लें
तू जो मेरे पथ में
दीप गा ले ओ उजाले
तो बंदगी हो जाए सफ़ल

तू जो मेरे सुर में
सुर मिला ले, संग गा ले
तो ज़िंदगी हो जाए सफ़ल