भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

तेरो मुख चंद्र री चकोर मेरे नैना / भगवत् रसिक

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

तेरो मुख चंद्र री चकोर मेरे नैना।
पलं न लागे पलक बिन देखे, भूल गए गति पलं लगैं ना॥

हरबरात मिलिबे को निशिदिन, ऐसे मिले मानो कबं मिले ना।
'भगवत रसिक' रस की यह बातैं, रसिक बिना कोई समझ सकै ना॥