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दबी-दबी बात /राम शरण शर्मा 'मुंशी'

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आसमान
झुका-झुका
झुकी-झुकी रात ।

दबे-दबे
पाँव बढ़ी
दबी-दबी बात ।

साँय-साँय
सिहर-सिहर
हिले-डुले पात ।

पात-पात
रात-रात
बिखर गई बात ।

पेड़ों की डाल-डाल
गेहूँ की बाल-बाल
किलक उठा प्रात !