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दशानन / कुलवंत सिंह

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 क्यूँ दशानन रावण को सब कहते हैं
उसके धड़ पर दस मुख ही क्यों रहते हैं
नहीं समझ में हमको कभी भी आता था
न ही हमको कोई यह समझाता था
 
पहन मुखौटा शातिर लोग रहते हैं
चेहरे पे चेहरा लगा कर मिलते हैं
देखा, जाना, सुना, पढ़ा और समझा था
कई दफा इस बात को खुद परखा था
 
फिर हुआ सामना मेरा इक हैवान से
जब मैंने की तुलना उसकी इनसान से
हुआ दंग मैं देख कर उसके चेहरे
एक नहीं था, कई-कई थे उसके चेहरे
 
जब मिलता था वह किसी भी शख्स से
खूब योजना बना के चलता था दिमाग से
हर बार दिखाता था वह अपना नया रंग
चेहरा नया, नया रूप और नया ढ़ंग

इक-इक, दो-दो नहीं, कई थे उसके रंग
हर इक पर इक रंग जमाता, होता जिसके संग
जिस पर उसका जो भी इक रंग था चढ़ता
वह उसको उस रंग का था ही समझता
 
लेकिन जिसने भी जाना उसको करीब से
देख के होता दंग चढ़े इतने रंग तरतीब से
बात एक थी और बड़ी हैरानी की
देनी होगी दाद उसकी शैतानी की
जिस पर अपना जो भी रंग था वह जमाता
किसके संग, बात कौन सी, कौन मुखौटा
 
याद सभी कुछ उसको रहता था तरतीब से
जब जब भी मिलता था वह किसी को फिर से
करता था वह बात वही और वही मुखौटा
रहती थी उसे बात याद हो कोई मुखौटा
 
जिससे मिलता वह लगा कर जो चेहरा
लगता सरल इंसां को वह असली चेहरा
देख देख हैरान मैं उसके कितने चेहरे
हर चेहरे पर नये चटकते रंग भरे

फिर बात समझ में आई, यह रावण का भाई
’काली विद्या’ इसने भी है कहीं से पाई
रावण के भी तो थे दस दस चेहरे
दस मुख से था मतलब शायद दस चेहरे
 
दशानन का तब मैंने यह मतलब जाना
दस मुंह से दस लोगों से दस बातें करना
दस चेहरों की क्षमता को रखने वाला
इसीलिए कहते रावण को दस मुख वाला