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दिन अगर ढल गइल / रवीन्द्रनाथ ठाकुर / सिपाही सिंह ‘श्रीमंत’

दिन अगर ढल गइल,
चिरइन के गीत अगर बंद भइल,
थाकल बयार जो थम गइल,
त हमरो के सघन घनघोर अंधकार से
खूब तोप ताप द, जतन से ढाँक द।
जइसे तूं सपना से धरती के ढाकेलऽ
जइसे तूं अलसाइल आँखन के तोपेलऽ
रजनी के शतदल कमलन के ढाँकेलऽ
जेकर राह खर्च बीचे राह में घट गइल बा,
चिंता के रेखा जेकरा चेहरा पर चढ़ गइल बा,
धूरा से लथपथ भेस-भूसा मलिन भइल बा,
बल जेकर अब तक टूटे-फूटे हो गइल ब,
ओकर सब घाव-दर्द करुण से तोप द
नया उषापान करा लाज ओंकर पोंछ द।।