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दिल अपना चाह रहा है कि मैं भी प्यार करूँ / कृष्ण 'कुमार' प्रजापति

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दिल अपना चाह रहा है कि मैं भी प्यार करूँ
ज़माना ठीक नहीं किस पे एतबार करूँ

गँवा दिया जिसे दिल ने अगर वो मिल जाए
लिपट के रोऊँ मैं आँखें अशकबार करूँ

बहुत दिनो से मेरा दिल तलाश करता है
कोई तो ऐसा मिले जिसपे जाँ निसार करूँ

जिन्हें पसीने से सींचा है , खू पिलाया है
मैं ऐसे फूलों का किस तरह कारोबार करूँ

ख़याल रखता है जो मेरी चाहतों का बहुत
बताओ क्यूँ न उसे प्यार बेशुमार करूँ

ग़ुबार दिल में जो ग़म का है, साफ़ हो जाए
जो अश्क़ ठहरे हैं मैं उनको आबशार करूँ

“कुमार” चोट छिपाने की मुझको आदत है
मैं अपने दर्द को किस तरह इशतहार करूँ