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दिल को आँखें तो मिलीं आप ने फिर क्या देखा / रवि सिन्हा

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दिल को आँखें तो मिलीं आप ने फिर क्या देखा
चश्मे-बातिन[1] से समन्दर ने तो गहरा देखा

उम्र चढ़ते हुए थी चाँद सितारों पे निगाह
और प्यासे ने उतरते हुए दरिया देखा

बूद[2] में रफ़्त[3] हक़ीक़त में तसव्वुर[4] क्यूँ है
फिर अनासिर[5] से मुशाहिद[6] का उभरना देखा

क़सम तो एक ही खायी थी निभाया है उसे
सौ मरासिम[7] थे मगर टूटना जिनका देखा

दिल की जागीर के मालिक तो अकेले हम थे
हर तमन्ना पे मगर अक़्ल का पहरा देखा

अब तमाशे भी कोई चैन से देखे कैसे
हर तमाशे में कोई और तमाशा देखा

उन चराग़ों की गवाही तो सहर सुन लेती
कौन है जिसने अँधेरे में अँधेरा देखा

शब्दार्थ
  1. अन्दरूनी आँख (inner eye)
  2. अस्तित्व (existence)
  3. प्रस्थान (departure)
  4. कल्पना (imagination)
  5. पंचतत्व (elements)
  6. प्रेक्षक (observer)
  7. रस्मो-रिवाज़, ताल्लुक़ात (custums, relations)