Last modified on 15 अप्रैल 2009, at 10:41

दिल को ग़मे-हयात गवारा है इन दिनों / क़तील

दिल को ग़म-ए-हयात<ref>जीवन का दुख</ref> गवारा है इन दिनों
पहले जो दर्द था वही चारा है इन दिनों

हर सैल-ए-अश्क़<ref>आँसुओं की बाढ़</ref> साहिल-ए-तस्कीं<ref>संतोष का तट</ref> है आजकल
दरिया की मौज-मौज किनारा है इन दिनों

यह दिल ज़रा-सा दिल तेरी आँखों में खो गया
ज़र्रे को आँधियों का सहारा है इन दिनों

शम्मओं में अब नहीं है वो पहली-सी रौशनी
शायद वो चाँद अंजुमन-आरा<ref>सभा की शोभा बढ़ाने वाला</ref> है इन दिनों

तुम आ सको तो शब को बढ़ा दूँ कुछ और भी
अपने कहे में सुबह का तारा है इन दिनों

क़ुर्बां <ref>भेंट</ref>हों जिसके हुस्न पे सौ जन्नतें ‘क़तील’
नज़रों के सामने वो नज़्ज़ारा है इन दिनों

शब्दार्थ
<references/>