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दिल जब से तिरे हिज्र में बीमार पड़ा है / लाला माधव राम 'जौहर'

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दिल जब से तिरे हिज्र में बीमार पड़ा है
जीने से ख़फ़ा जान से बे-ज़ार पड़ा है

सौदा न बना गेसु-ए-जानाँ से तो क्या ग़म
ले लेंगे कहीं और से बाज़ार पड़ा है

परहेज़ तप-ए-हिज्र से है तुझ को जो ऐ दिल
तू और भी आगे कभी बीमार पड़ा है

फ़रमाइए रोके से रूके हैं कभी आशिक़
दरवाज़े पे क़ुफ़्ल आप के सौ बार पड़ा है

मैं दैर ओ हरम हो के तिरे कूचे में पहुँचा
दो मंज़िलों का फेर बस ऐ यार पड़ा है

की तर्क-ए-मोहब्बत तो लिया दर्द-ए-जिगर मोल
परहेज़ से दिल और भी बीमार पड़ा है

तौक़ीर हीं अंजुमन-ए-ख़ास में दिल की
शीशा तिरे मयख़ानों में बेकार पड़ा है

कुछ शाम-ए-जुदाई में सुझाई नहीं देता
पर्दा ख़िरद ओ होश पे ऐ यार पड़ा है

‘जौहर’ कहीं बिकती ही नहीं जिंस-ए-मोहब्बत
क्या कह़त वफ़ा का सर-ए-बाज़ार पड़ा है