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दिल रखने को / राम सेंगर

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दिल रखने को नहीं छिपाई
मन की कोई झोल ।

कोशिश की
धड़कनें समेटीं
था कुछ और न पास ।
जाने किस खोए को
हरदम
करते रहे तलाश ।
पुनरभ्यासों में सुने सहे
सारे बोल -कुबोल ।

सालोंसाल
रहे ठहरे
जिन अपरिचयों के बीच ।
उन्हें अन्ततः
खुले गटर में
आए हमीं उलीच ।
ख़लल -खोट से लड़ी-निभी को
रखा हर तरह खोल ।

समझ निरापद
घुस अतीत में
की राहत की खोज ।
लेकर लौटे
उम्मीदों पर
नए दुखों का बोझ ।

अमँगलों ने हौंस जगाई
दुनिया गई न डोल ।

इसी हाल में
हर बवाल से
हुए रहे दो-चार ।
यही लतीफ़ा
जिजीविषा है
लदे-फन्दे की पार ।
लबाड़ियों के चित्तराग में
मिले न इसकी तोल ।