मच्छरों कीट पतंगों से पटे
घने जंगल
हहराता अथाह सागर
रोशनी का दायरा
खंडहर हो चुकी
इमारत पर रुकता है
गूंजती है आवाज़
यह काले पानी की
सजा पाये
आजादी के मतवालों का
यातना गृह है
न हवा ,न पानी
न मनुष्य होने की गंध
न मानवता का लेश मात्र
केवल इंतज़ार
यातना का
यातना की पीड़ा का
और फिर फांसी के फंदे का
दुर्भाग्य कि सजा
पाने वाला भी भारतीय
निगरानी करने वाला भी भारतीय
बस हुक्मरान अंग्रेज
सालों साल गुजरे हैं
इस यातना गृह में
खटते, सुलगते
मातृभूमि के लिए
तड़पते शूरवीरों को
कहाँ दिखा होगा
रंग बिरंगा सागर
दिखा होगा तो
बस काला पानी
जिसे तैर कर
उस पार
पहुँचने के ख़्वाब
हर रात
चकनाचूर होते रहे
हर रात
इंतजार करते रहे
भारत की आज़ादी का
अपनी निर्मम
यातनाओं को
अनदेखा कर
झूल गये
फांसी के फंदे पर
फेंके गए
उस रंग बिरंगे सागर में
जिसे हुक्मरान
कालापानी कहते थे
पर हुक्मरान नहीं डुबा पाए
उनके जज्बे को,शौर्य को
जो दीपस्तंभ बन
राह दिखाता है
भटके सागरिक को