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दू मुक्तक / कुबेरनाथ मिश्र 'विचित्र'

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रउआँ अइतीं त अँगना अँजोर हो जाइत।
हमार मन बाटे साँवर ऊ गोर हो जाइत।
जवन छवले अन्हरिया के रतिया बाटे।
तवन रउरी मुसुकइला से, भोर हो जाइत।।

जवना सरसों से भूतवा झराए के बा।
भूत ओही सरसउआ में घूसल बाटे।
जवना नेता के दुखवा सुनावे के बा।
लोग ओही के चमचा के चूसल बाटे।।