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दृगन मन बस गये री मोरे गुइया / बुन्देली

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

दृगन मन बस गये, री मोरे गुइयां
कै मोरी गुइयां, दशरथ राज दुलारे
गैल इत कड़ गये, री मोरी गुइयां। दृगन मन...
कै मोरी गुइयां, हांथ सुमन के दौना,
लतन बिच छिप रहे, री मोरी गुइयां।। दृगन मन...
कै मोरी गुइयां तक तिरछी सैनन
विहंस कछु कह गये, री मोरी गुइयां।।
कै मोरी गुइयां कंचन प्राण पियारे,
चोर चित लै गये, री मोरी गुइयां। दृगन मन...