भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

देह / जया जादवानी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

कपड़ा एक नया नकोर
ल्कलफ़ लगा
सफ़ेद
लौटाते हुए सोचती हूँ
काश एक ही धब्बा लगा होता
ज़रा सा मसला गया होता
धुला होता कम से कम
एक बार
पटक-पटक कर
तुम्हारे खाट पर...।