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दोहा / भाग 11 / राधावल्लभ पाण्डेय

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तीखी तेलिन स्नेह से, जिन कोल्हू में पेल।
कितने ही मन तिलों से, है निकालती तेल।।101।।

निशिदिन बाँकी बनिन है, रखती खुली दुकान।
किसको आटा दाल का, भाव न पड़ता जान।।102।।

‘इन्दु’ निबाहति केवटिन, नदी नाव संयोग।
पार लगावति खेइ कै, बुरै भलै सब लोग।।103।।

है रंगने का इन्दु कवि, अनुपम अपना ढंग।
कभी न चढ़ कर उतरता, रँगरेजिन का रंग।।104।।

रोज घुलावति दर्जिनी, इन्दु बिहँसि तजि लाज।
जब जैये तब देतिकहि, अबै बनो नहि काज।।105।।

लोहौ को पिघलाय यह, पानी धरती ललाम।
बल से अपने चाय के, करति लुहारिन नाम।।106।।

ओटन धुनकन भरन श्रम, सहनो सहज न काम।
नाहीं करति न तउ कबहुं, धुनकिन सीधी बात।।107।।

ग्वालिन गुहरुवात गलिन, गोरस गाढ़ो लेहु।
खटौ मिठो लखि लेहु चखि, इन्दु दाम तब देहु।।108।।

सब को ढ़ाँकति नंगपन, ताने बाने माहिं।
सारी बै है गुन भरी, कोरिन कोरी नाहिं।।109।।

काछिन बारी देखि कै, मन सब को हरियाय।
सुन्दर सब्जी बैंगनी, रहो छटा छवि छाय।।110।।