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दोहा / भाग 4 / बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’

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परि कै सृजन प्रवाह में, हम पूछत हम कौन?
ऊतर में कहि जात कोउ, तुम बुद-बुद तुम पौन।।31।।

हम न वारि बुद-बुद क्षणिक, हम न पवन आगार।
फैल्यौ अगम अनादि लौं, अपनो कुल विस्तार।।32।।

दैहिक पिंजर-बद्ध हम, तदापि न सीमा युक्त।
हम हँसा आकास के, सन्तत बन्धन मुक्त।।33।।

निहचै आज थके रुँधे, विवश हमारे प्रान।
पै अबाध गतिवान हम, इतनों हमकौं भान।।34।।

हमें विवश लखि कहत सब, हम जड़ धूलि विकार।
पै हमकौं कबु यौं लगत, हम न जांय-विचार।।35।।

सब फीके परि जात हैं, तर्क विवाद विस्तार।
जब हिय तल तैं उठत है, ‘न-इति’-‘न-इति’ गुंजार।।36।।

कासों कहिये रंचहू, अपने मन की पीर।
कैसें बने दिखाइबौ, निज ही तल कौं चीर।।37।।

रटत नाम सुमिरन करत, बौरान्यो मन-कीर।
जोहत पथ इक टक सतत, उमंगयो नैनन नीर।।38।।

शिला खण्ड पै बैठि हम, नित हिय लोचन चीर।
देखि रहे जग-मग-चलत, इन पन्थिन की भीर।।39।।

हमे अहम आसन मिल्यो, मिली प्रतीक्षा पीर।
मिली उपेक्षा; और मिले, उपालम्भ के तीर।।40।।