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दो मुट्ठी भी धान नहीं / हेमन्त श्रीमाल

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उत्तर दो ऐ दौलतवालो! क्या हम भी इन्सान नही।
मेहनत की बूँदों के बदले दो मुट्ठी भी धान नही

साँसें गिरवी रखकर भी हम आस नहीं कर पाते हैं
सपनों की क्या बात करें जब पेट नहीं भर पाते हैं
हम वो पत्ते जो पकने के पहले ही झर जाते हैं
आँचल रीता पाकर बच्चे होते ही मर जाते हैं
मुर्दा घोषित कर दो या फिर कह दो हम बेजान नहीं

बापू की बूढ़ी आँखों को ऐनक बहुत ज़रूरी है
बरसों से तीरथ दर्शन की माँ की आस अधूरी है
उस पर दो बहिनों की चिन्ता जिनकी उम्र सिन्दूरी है
घरवाली क्या कहे बेचारी उसकी भी मज़बूरी है
निर्धन के दिल में भी होते क्या कोई अरमान नहीं

रक्त स्वयं का स्वेद बनाकर तुम्हें समर्पित करते हैं
उससे ज़्यादा दे देते है जितना अर्जित करते हैं
क़दम क़दम पर हम मेहनत के अक्षर अंकित करते हैं
तुमसे कुछ लेने से पहले तुमको अर्पित करते हैं
माँगा है तो हक माँगा है, भीख नहीं अनुदान नहीं

हम भी चोरी कर सकते हैं डाके डलवा सकते हैं
चाकू की नोकों के बल पर चेन उतरवा सकते हैं
बन्दूकें दिखला-दिखलाकर बस को रुकवा सकते हैं
बस तो क्या है रेलों तक को अगवा करवा सकते हैं
अब भी सम्हलो जाग न जाए भीतर का शैतान कहीं