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धत् तेरी के! / सतीश मिश्रा

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धत् तेरी के! लोर? पोंछ रे मरदे!
रोवऽ हें भरल जवानी में?
तोर उमर तो ओइसन हे, जे आग लगा दे पानी में।

सुरता कर, बइसाख-जेठ में कइसन चिनगी दहक रहल हल
चन्नन के गाछी से निकलल पुरबा-पछया लहक रहल हल
साँप पोदीना में लपटाएल हाँफ रहल हल, अगिआएल हल
पीअर अबटन लगलो पर भी गोर कनेवाँ करिआएल हल
पर असाढ़ के पहिले दिन जब उमड़-घुमड़ के घहरल बदरी
सौ-सौ घड़ा बरस गेल तलफल सूरुज के मरदानी में।
तोर उमर तो ओइसन हे, जे आग लगा दे पानी में।

घूम रहल हे जब पहिआ तो उपरे वाला नीचे अैते
कोई न रोकत, घुमते-घुमते नीचे वाला उपरे जैते
रात देख के मत घबरो तूँ, रात तोरा भिर ठहर न पैते
बुतरू हे हनुमान, भला ऊ लाल इंगोरा कहाँ पचैते?
जइसे गुजरल सावन-भादो, पूस-माघ भी गुजरत ओइसे
पतझर हारत, फुजकत पत्ता मुरझल रुख के कानी में।
तोर उमर तो ओइसन हे, जे आग लगा दे पानी में।

हार के डर से काम न करना-मुरदा के पहचान
देख के बाधा विचलित होना-मुरदा के पहचान
अपन राह पर चलते जाना-जिन्दा के पहचान
चलते-चलते जान गँवाना-जिन्दा के पहचान
मिले, अगर जो मिले सफलता, दूर रहे तों कोई बात न
कभी पताका झुके न पावे उद्यम के रजधानी।
तोर उमर तो ओइसन हे, जे आग लगा दे पानी में।