धन्य जसोदा नन्द धन, धन बज मंडल देस।
आदि निरंजन 'सहजिया' भयो ग्वाल के भेष॥
निर्गुन सर्गुन एक प्रभु देख्यो समझ विचार।
सतगुरु ने आँखी दइ, निहचै कियो निहार॥
धन्य जसोदा नन्द धन, धन बज मंडल देस।
आदि निरंजन 'सहजिया' भयो ग्वाल के भेष॥
निर्गुन सर्गुन एक प्रभु देख्यो समझ विचार।
सतगुरु ने आँखी दइ, निहचै कियो निहार॥