भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

धुआँ / मख़दूम मोहिउद्दीन

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

जन्नत ख़ाक[1] पे जिस रात उतर आई थी
बदलियाँ रहमते यज़दा[2] की जहाँ छाई थी ।
इशरत-ओ-ऐश[3] की जिस जा के फ़रादानी[4] थी
जिस जगह जल्वा फिगन[5] रूहे जहाँबानी[6] थी ।

        हाँ, वहीं मेरे दिले ज़ार ने ये भी देखा
        हाँ, मेरी चश्मे गुनहगार ने ये भी देखा
        ख़ूने दहकाँ में इमारत के सफीने थे रवाँ ।
        हर तरफ़ अहल[7] की जलती हुई म‍इयत का धुआँ ।

शब्दार्थ
  1. धरती
  2. ईरान के पुराने अग्निपूजक
  3. ऐश्वर्य
  4. ज़रूरत से ज़्यादा
  5. दर्शन देने वाला
  6. राज्य
  7. जनता