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धूप थी, लंबा सफ़र था, दूर तक साया न था / डी. एम. मिश्र

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धूप थी, लंबा सफ़र था, दूर तक साया न था
सामने चट्टान थी फिर भी वो घबराया न था

नाज़़ुकी देखी थी उसकी आज हिम्मत देख ली
दोपहर का फूल था वो फिर भी कुम्हलाया न था

लग रहा था डर कहीं चूजों को बिल्ली खा न ले
जब तलक उड़ने का उनमें हौसला आया न था

झोपड़ी गिरती थी उसकी फिर उठा लेता था वह
कौन-सा तूफ़़ान था जो उससे टकराया न था

वक़्त की हर मार उसने मुस्कराकर झेल ली
मुफ़लिसी थी सिर्फ़ घर में कुछ भी सरमाया न था

चार दिन की ज़िंदगी में काम करने हैं हज़ार
बात इतनी सी किसी ने उसको समझाया न था