भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

धूप में छाँव लुटा दूँ तो चलूँ / लाला जगदलपुरी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

और कुछ दर्द चुरा लूँ, तो चलूँ,
आँसुओं को समझा लूँ, तो चलूँ ।

दर्द बे-ठौर हो गए हैं जो
उन्हें हृदय में बसा लूँ, तो चलूँ ।

गुलाब की सुगंध-सा बह कर,
भोर का मन महका दूँ, तो चलूँ ।

ठहरो, किरनों की गठरी को,
ठीक से सिर पे उठा लूँ, तो चलूँ ।

ज़िन्दगी यह तपती दोपहरी,
धूप में छाँव लुटा दूँ, तो चलूँ ।

जिसे डुबा न सके साँझ कोई,
ऐसा इक सूर्य उगा लूँ, तो चलूँ ।