भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

धूप / कविता वाचक्नवी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

धूप

हम
सुबह की प्यालियों में
धूप भर कर
नाचते हैं
और
अंधेरा अकेला
रात- भर में
बीनता है।