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नदी के उस पार ...इनसान नहीं हैं / साहिल परमार

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नदी के उस पार बसते हैं
वो इनसान नहीं हैं.
उन के हाथ नही
हाथा है।
ये हाथे
उस पार से छलांग लगाकर
इस पार आ जाते हैं
दूर-दूर की बस्तियों में
घुस जाते हैं हमारे हाथो में
 
फिर आगजनी होती है
अम्बेडकरनगर और ग़रीबनगर में
भाले-बर्छियाँ लड़ते है अमन चौक में
धमाके होते हैं दरियापुर में
प्राइवेट फ़ायरिंग होती है गोमतीपुर में।
 
यह सब होता है बार बार
यह सब कर सकते हैं वे लोग
क्योंकि
गोमतीपुर में बसे हुए लड़के के हाथ में
बन्दूक है
पर ट्रिगर दबानेवाली उँगलियाँ
उन लोगों की हैं।

इस नदी के उस पार बसते है
वे इनसान नहीं हैं
उन के मुँह नहीं हैं
सकर्स है
मिलें पुर जोश मे चलाकर
मुनाफ़े में ख़ून सोखकर मज़दूरों का
वे लोग
खोलते हैं किण्डरगार्टन और कोनवेन्ट,
कोलेज और साईंस इंस्टिट्यूट
और पढ़ाते है अपने बच्चों को
इंग्लिश और कॉमर्स।

स्टेट और माइक्रोबायोलोजी ,
विमेन लिबरेशन और लेटेस्ट टेक्नोलोजी
और फिर धड़ल्ले से मिलें कर के बन्द
ये तैयार हुए स्पेशियलिस्ट
हमें पढ़ाते हैं
शिक्षा नवरचना और जागृतिकरण के पाठ
उनको उलटे और पुलटे
सीधे और आड़े
सभी पाठ आते हैं।

उनके हाथ में किताबें हैं क्योंकि
पटनी शेरी में रहने वाले लडकों की जेब में
बीड़ी के ठूँठ हैं
और लड़कियों के कन्धों पर
कागज़ बीनने के झोले हैं।

नदी के उस पार बसते हैं
वो इनसान नहीं हैं।

उन के पाँव नहीं
मर्सिडीज और शेवरलेट हैं
येझदी और बुलेट हैं
जिनकी टंकियों में पेट्रोल नहीं
तेरा और मेरा पसीना
ठूँस कर भरा है.
पेट का पानी भी हिले-डुले नहीं ऐसे

उन की मर्सिडीज उड़ती है धनाधन
क्योंकि हमारी साइकिलें
लाकड़ा मिल के रेलवे क्रासिंग से
चार तोड़ा क़ब्रिस्तान पहुँचते-पहुँचते
सात सौ सत्तर बार
गड्ढे में पछाड़ खाती हैं।

इस नदी के उस पार बसते हैं
वो इनसान ही नहीं हैं।

उनके कान नहीं
सिलेक्टिव रिसीवर्स हैं।
उन्हें सुनाई देती हैं
किसी कोने मे उखाड़े जाते
पौधे की झीनी चीख़
और नहीं सुनाई देती रोज़ रात
घनघोर अन्धेरे में कराहती
झुग्गियों की चीखें।

पत्थरों की धुआँधार बारिश से
धड़-धड़-धड़-धड़ धड़ाहट खनकती
जोगेश्वरीनगर की
पतरीली छत की आवाज़
उन्हें सुनाई नहीं देतीं
क्योंकि
उन्हें तो सिर्फ़ सुनाई पड़ती है
खाड़िया में राउण्ड लगाती पुलिस की
कुछेक लाठियों की आवाज़।

वे लोग
सुनते हैं उन को सुनना होता है वही
और जो उन को नहीं सुनना होता
हरगिज नहीं सुनते
क्योंकि
हम जैसे बहरे हैं,
जैसे कुछ भी नहीं सुन सकते।

इस नदी के उस पार बसते हैं
वो इनसान ही नहीं हैं।

उनकी आँखें नहीं
सिलेक्टिव स्पेक्टेकल्स हैं
उन्हें दिखाई देते हैं
केरल पुलिस ने नहीं पकड़े हुए
उर्मिला पटेल के हाथ और भावना शाह् के कन्धे
और नहीं दिखाई देते
बिहार रेजिमेन्ट के जवानों की
लाठियाँ खाकर
लाल हो गई
लछमिया और मछमिया की पीठ।

उन्हें अम्बेडकरनगर की रईली के
ख़ून के धब्बेवाले लहँगा और साड़ी
दिखाई नहीं देते क्योंकि
उन्हें दिखता है सिर्फ़
प्रमिला पटेल का
फटा हुआ ब्लाउज।

वे लोग सिर्फ़ वही देख सकते है
जो उन्हें देखना है और
उन को हरगिज नहीं दिखता,
जो उन्हें नहीं देखना होता है क्योंकि
हम जैसे अन्धे हैं ,
जैसे कुछ भी नहीं देख पाते।

इस नदी के उस पार बसते हैं
वो इनसान नहीं हैंं।

उन की जुबान नहीं,
न्यूज पेपर्स हैं।
जहाँ बिल्ली भी न फटकी हो वहाँ
बारह हज़ार की रैली
उन्हें रात को सपने में आती है।
सुबह उठते ही वे
उस की वाहवाही करते हैं
और जहाँ हज़ारों उमड़े हों वहाँ
’जैसे कोई न आया हो’ की तरह चुप हो जाते है।

जहाँ कंकर भी न गिरा हो वहाँ
पहाड़ के पहाड़ गिर पड़ने का
वे शोरगुल मचाते हैं
और जहाँ बड़े बड़े पर्वत
कंकर-कंकर हो कर बरसे हों
वहाँ कुछ न घटने का
वे मौन धारण कर लेते हैं।

मन्दिर टूटने का
और मूर्तियाँ खण्डित होने का शोरगुल
वे चारों दिशाओं में फैलाते हैं
और पंचदेव के मन्दिर में
हमें चुपड़ाई जाती ग़ालियों को
वे अपने टेलीप्रिण्टर की टिक-टिक में
दबा देते हैं।

तोड़े गए टेप रिकोर्डर
वीडियो और रेडियो के धमाके से
वे हमारे कान भर देते हैं
और हमारे केशु और बालु की
ज़ख़्मी देह को वे
दियासलाई और डिब्बे की आवाज़ भी किए बगैर
स्याही छिड़क कर जला देते हैं।

वे लोग वही बोलते हैं
जो वे बोलना चाहते हैं.
और वे तो कभी नहीं बोलते हैं
जो उन्हें नहीं बोलना होता है क्योंकि
हम जैसे गूंगे हैं
जैसे कुछ भी नहीं बोल पाते।

इस नदी के उस पार बसते हैं
वो इनसान ही नहीं हैं।

उनके दिमाग नहीं
साज़िश के कारख़ाने हैं।
वे लोग स्वनियुक्त दाता हैं।
उनकी दी हुई घास खाते
रथयात्रा के हाथी
पुलिस वैन को धकिया सकते हैं
और शहर की सड़कों पर
आराम से सोए कर्फ़्यू को
अपनी सूँड के जरिए
जगाकर
पाँव तले रौंद सकते हैं।

आर्मी की स्टेनगन और मशीनगन
यह तमाशा
परेशान होकर भी देख सकतीं हैं।
उन उन्मादी हाथियों के बजाय
उलझकर पत्थर फेंकते इनसानों पर
स्टेनगनें टूट पड़ती हैं।
यह भी उनकी साज़िश के
कारख़ानों का ही कमाल है।

उन के पाले हुए भगवा तोते
“धर्म पत्थर है” जैसा अर्धसत्य ही रटते हैं
पर वह पत्थर हमारे ही सर फोड़ता है
यह सत्य वो कभी नहीं कहते
और हम भी
उनके अर्धसत्य को मान लेते हैं
वह भी उनके साज़िश के
कारख़ानों का ही कमाल है.
उनके ये कारख़ाने
चलते है धूम-धड़ल्ले से
क्योंकि हम
अपने दिमागों को
उनके चंगुल से
कभी मुक्त नहीं होने देते।

इस नदी के उस पार बसते हैं
वो इनसान ही नहीं हैं।

उनके पेट नहीं,
हिन्द महासागर हैं।
हमारा पसीना बरसता ही रहे,
बरसता ही रहे
फिर भी वे 'जैसे थे'।
हमारे झोंपड़े टूटते ही रहें
टूटते ही रहें
फिर भी 'ॐ स्वाहा'...
हमारी खदानें तलहटी होती रहें
होती ही रहें
फिर भी 'ॐ स्वाहा'...
हमारे हँसिए
फ़सल काटते ही रहें
काटते ही रहें
फिर भी 'ॐ स्वाहा'...
हमारे जंगल कटते ही रहें
कटते ही रहें
फिर भी 'ॐ स्वाहा' ...
हमारे मांसल स्नायु क्षीण होते ही रहें
हड्डियाँ गलती ही रहें
फिर भी 'ॐ स्वाहा'.
वे लोग
सब कुछ खा सकते है
क्योंकि
हम खाने लायक
कुछ भी झपट नहीं सकते ,
छीन नहीं सकते.


१. सकर्स : चोखने का,चुसने का यन्त्र
२. सिलेक्टिव रीसीवर्स : वही आवाज ग्रहण कर सके,जो वह ग्रहण करना चाहते हैं और वह आवाज ग्रहण न कर सके जिसे वह ग्रहण करना नहीं चाहता.

३. सिलेक्टिव स्पेक्टेकल्स : ऐसे चश्मे जो वही दिखाए जिसे वे देखना चाहे और वह दिखाए ही नहीं जिसे वे देखना नहीं चाहते.

मूल गुजराती से अनुवाद : स्वयं साहिल परमार