निरुत्तर बुद्ध / संतोष श्रीवास्तव
बुद्ध !
कलम नहीं थी न तुम्हारे पास
इसीलिए सोती हुई
यशोधरा के प्रेम, विश्वास ,समर्पण से
पलायन कर गए तुम
कलम होती
तो लिखा ले जाती तुमसे
तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर
कलम में ईश्वर का वास है
कलम पकड़ लेती है
जीवन के दुखों को
जिसकी खोज में तुम
बरसो बोधि वृक्ष के नीचे
करते रहे तप
उस बोधि वृक्ष को
उसकी जड़ों ,पत्तों को
एक बार भर नज़र देख लेते
तप किए बिना ही
पा जाते उत्तर
पीत पर्णो का गिरकर
नए पर्णो का उगना
जड़ों का थामे रहना भार
मौसम चक्र से एक दिन
समा जाना मिट्टी में
यही तो जीवन है
कलम बता देती न तुम्हें
कि प्रकृति चक्र से
हर जीव बंधा है
बिना तप के ,बिना पत्नी
और पुत्र के त्याग के
पा जाते तुम समाधान
आज तुम पूज्य हो
पर मेरे लिए कठघरे में खड़े हो
मेरी क़लम प्रश्न कर रही है तुमसे
पर तुम निरुत्तर हो
बुद्ध!